नाहीं कुछ ऊ कहल जात बा
आ न कुछ ऊ सहल जात बा
उन कऽ एतना निसाना सधल
हमरे पर कुल लहल जात बा
गीत
बन-वन बोलेलै कोइलिया कि जैसे मोरे
मोरे मनवा कऽ पिरिया रिसाई हो
केते दिन बितलें सपन मोरी अँखिया कऽ
अँखिये में गइलें - रिसाई - हो
दिनवाँ - महिनवाँ, बरिसवा गिनत मोरी
अंगुरी क पोरवा -पिराई - हो
दियना के धुववाँ से अँगना के तुलसी कऽ
बिरवा - गइल - सवराई - हो
नयना भइले मोरे बदरा कुअरवा कऽ
लोरिया - अनेसुही - सुखाई हो
सपना में मिलना आ जगला में विरहा कऽ
दुनिया - हसइ अगराइ हो
शब्दार्थ
१. लहल = सिद्ध; २. रिसाई (पंक्ति २ में) = उभरना; ३. रिसाई (पंक्ति ४ में) = खत्म होना; ४. अनेसही = व्यर्थ में; ५. अगराइ = प्रसन्न होना ।