चौपदा : गीत - श्री शतानन्द उपाध्याय | Chaupada : Geet - Shrī Shatānanda Upādhyāya

नाहीं कुछ ऊ कहल जात बा 
आ न कुछ ऊ सहल जात बा 
उन कऽ एतना निसाना सधल 
हमरे पर कुल लहल जात बा

गीत

बन-वन बोलेलै कोइलिया कि जैसे मोरे 
मोरे मनवा कऽ पिरिया रिसाई हो

केते दिन बितलें सपन मोरी अँखिया कऽ
अँखिये में  गइलें - रिसाई - हो

दिनवाँ - महिनवाँ, बरिसवा गिनत मोरी 
अंगुरी क पोरवा -पिराई - हो 

दियना के धुववाँ से अँगना के तुलसी कऽ 
बिरवा - गइल  - सवराई - हो

नयना भइले मोरे बदरा कुअरवा कऽ
लोरिया - अनेसुही  - सुखाई हो 

सपना में मिलना आ जगला में विरहा कऽ 
दुनिया - हसइ  अगराइ हो

शब्दार्थ

१. लहल = सिद्ध; २. रिसाई (पंक्ति २ में) = उभरना; ३. रिसाई (पंक्ति ४ में) = खत्म होना; ४. अनेसही = व्यर्थ में; ५. अगराइ = प्रसन्न होना ।

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